रससिद्धांत में शृंगार, हास्य और करुण रस के बाद रौद्र रस का स्वरूप प्रकट किया गया है। इस रस निष्पत्ती का स्थायीभाव क्रोध है। इसलिए जब रुद्र रस अभिव्यक्त किया जाता है, तो उत्साह, आवेग, शीघ्रता, उग्रता और उत्तेजना दिखाई देती है। रौद्र रस की व्याख्या करते हुए भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में रौद्र रस के कर्मों की व्याख्या निम्नलिखित श्लोक में की है –


ताडनपाटनपीडनच्छेदनप्रहरणशस्त्र – सम्पातसम्प्रहाररुधिराकर्षणाद्यानि कर्माणि


ताडन का अर्थ है शरीर पर प्रहार करना, पाटन का अर्थ है टुकड़े-टुकड़े करना, पीडन का अर्थ है दबाना, छेदन का अर्थ है एक दूसरे से अलग करना इत्यादि कर्मोंका अंतर्भाव रौद्र रस में होता है।


शिल्पकला में क्रोधात्मक रौद्ररूप का दर्शन, देवी काली के रूप में होता है। माँ काली की प्रतिमा और उससे उत्पन्न होनेवाले रौद्र रस का अनुभव करने से पहले, देवी का स्वरूप और उद्भव देखना अधिक अनुकूल होगा। मार्कंडेयपुराण, लिंगपुराण, देवी भागवत जैसे पुराणों और तंत्र साहित्य में देवी काली का स्वरूप अधिक स्पष्ट किया गया है। पार्वती का उग्र स्वरूप ही काली है। काल पर आधिपत्य होने के कारण इन्हें काली कहा जाता है।


कालसङ्कलनात् काली सर्वेषामादि रूपिणी |
कालत्वादादिभूतत्वादाद्या कालीति गीयते ||


तात्पर्य यह है की, देवी काली अपने अंतस्थ, समय को एकतत्रित करती हैं। वही अंत है और आरंभ स्वरूपीनी है। कालत्व अर्थात वह गुण जिसके द्वारा काल उत्पन्न किया जाता है। काल का आरंभ काली से शुरू होता है इसलिए इन्हें आद्या भी कहा जाता है।

देवी काली के उद्भव की विभिन्न कथाएँ हैं। दशम महाविद्या स्वरूप में काली की पूजा होती है। परंतु देवी काली का रौद्र यह स्थायी भाव मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में वर्णित है।

ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन्प्रति |
कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा ||
भृकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम् |
काली कराल वदना विनिष्कानतासिपाशिनी ||

उपरोक्त श्लोक का तात्पर्य यह है की, चन्ड और मुंड की राक्षसी सेना देवी पर धनुष ताने खड़ी है, यह देख अंबिका का चेहरा क्रोध से काला हो जाता है, उनकी भौहें क्रोध से चढ़ती हैं और उसमें से साक्षात काली प्रकट होती हैं। काली का वर्ण काला है और वह हाथ में खड्ग और खट्वांगं धारण किए अपने उग्र स्वरूप में राक्षसों के सामने आती है।


शिल्पियों ने देवी काली के कई रौद्र रूप, प्रतिमाओं के माध्यम से व्यक्त किये है। युद्धभूमी पर काली ने रौद्र भाव को प्रकट किया है। इसलिए, युद्धभूमि पर असुरों को मारकर रौद्र तांडव करनेवाली काली का साकार स्वरूप हमे कालि के नृत्यशिल्प से देखा जा सकता है। कर्नाटक के हलेबिड में होयसलेश्वर मंदिर में, रौद्ररुपिणी काली की प्रतिमाएं हैं। यह शिवमंदिर 12वीं शताब्दी में होयसल वंश के विष्णुवर्धन ने बनवाया था। होयसल शैली की इस प्रतिमा में षड्भुजा काली नृत्यमग्न दिखाई दे रही हैं। वह अपने सेवक गण से घिरी हुई है। वह अपने हाथों में खड्ग, सर्प, डमरू, त्रिशूल, कपाल और नरमुण्ड धारण किए है। सालंकृत देवी काली के गलेमें जो रुण्डमाला है वह नृत्य के लय में लयबद्ध होकर लहरा रही है। क्रोधसे काली की आँखें और चौड़ी हो जाती हैं। चर्या पर उत्पन्न रौद्र भाव स्वाभाविक दिखा जा सकते हैं। इसलिए रौद्र रस में काली की प्रतिमाओं में उत्साह, आवेग, शीघ्रता, उग्रता और उत्तेजना दिखाई देती है ।


नवरस और देवी शिल्प इस शृंखला के अगले भाग में, देवी शिल्प से अभिव्यक्त होनेवाला वीररस की चर्चा करेंगे ।

3 thoughts on “रौद्र रस – काली : नवरस और देवी शिल्प”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *