अब तक हमने शृंगार रसपूर्ण उमामहेश्वर अलिंगन प्रतिमा और हास्य रस की अभिव्यक्ति करनेवाला सप्तमातृका शिल्पपट देखा है । नवरस और देवी शिल्प की आज तिसरी कड़ी प्रस्तुत है, करुण रस – त्रिपुरा ।
शोक यह करुण रस का स्थायीभाव है। नाट्यशास्त्र में इस रस की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि करुणा रस की उत्पत्ति श्राप, क्लेश, पतन, वियोग, हानि, मृत्यु जैसे विभावों के कारण होती है। आचार्य श्रीशंकुक के अनुसार दयायुक्त हृदय की भावना को भी करुण माना गया है। बेशक, यह दृष्टिकोण नाट्यशास्त्र की दृष्टि से इतना प्रशंसनीय नहीं है। लेकिन शिल्पकला और रसभाव इन दोनों के संयुक्त चिंतन से आचार्य का यह मत देवी शिल्प और उससे जुड़नेवाला करुणा रस इन दोनों के लिए प्रासंगिक हो सकता है। देवी का प्राकृतिक तत्त्व दयाभाव से परिपूर्ण है । इसलिए देवी स्वरूप से उत्पन्न करुणा को अधिक गहराई से समझा जा सकता है।
चित्रसूत्र में करुण रस के लिए श्लोक इस प्रकार आया है –
याञ्चाविरहसंत्यागविक्रियाव्यासनादिषु |
अनुकम्पितकं यत्स्याल्लिखेत्तेत्करुणे रसे ||
उपरोक्त श्लोक का तात्पर्य है की चित्र में करुणा दिखाते हुए याचना, वियोग, त्याग, विपदा या आपत्ती की स्थिति दिखानी चाहिए। इसी श्लोक के आधार पर हमे देवी शिल्प में करुणा की भावना को अब समझना है।
प्राचीन काल से भारतीय परंपरा में नारी का देवी स्वरूप अत्यंत पूजनीय और संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना गया है । दुनिया की कई संस्कृतियों में देवी को माता स्वरूप में पूजनेकी परंपरा रही है। मातृदेवताओं की पूजा और उनका प्रभुत्व प्राचीन काल से देखा जा सकता है। सृष्टि, सृजन, भरण, पोषण, क्षमा, शांती, दया, ममत्व की कल्पना करके मनुष्य ने देवी जगन्माता के रूप में उनकी कृपा और आशीष पाने का प्रयास किया है। देवी का करुणामई स्वरूप उनके सौम्य, रौद्र या भयानक सभी रूपो में छलकता है, इसका प्रमाण पौराणिक कथाओं में वर्णित देवी स्वरूप मे हैं।
कारुण्यरूपा त्रिपुरा
देवी के माता स्वरूप का स्थायीभाव करुणा है। इस प्रकार यह बुरी शक्तियों और अज्ञानता को नष्ट करके भक्त को सुरक्षा और शांति प्रदान करती है। प्रतिमाओं में, देवी के कई रूपों को करुण रस के उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। टी. ए. गोपीनाथ राव ने Elements of Hindu Iconography में देवी त्रिपुरा का उल्लेख किया है। गौरी का एक रूप त्रिपुरा है। चतुर्भुजा देवी के पार्श्व दो भुजाओं में अंकुश और पाश यह दो आयुध हैं। और अपने दो भुजाओं में अभय और वरद मुद्रा धारण की हैं। भाद्रपीठ पर पद्मासन में आसनस्थ त्रिपुरा का यह शिल्प है। तीन नेत्रवाली इस त्रिपुरा देवी का मस्तक जटामुकुट से मंडित है । उपरोक्त उल्लेख से, यदि भक्त के लिए देवी के हृदय में करुणा उत्पन्न होती है, तो इसे करुणा रस कहा जा सकता है। देवी के अभय और वरद हस्त इस प्रतिमा के माध्यम से उनकी करुणामय भाव के दर्शन करा रहे हैं। भक्तों को अभय हस्त के रूप में अभय देनेवाली और वरद हस्त के रूप में वरदान प्रदान करनेवाली यह त्रिपुरा देवी समस्त संसारपर अपनी दयादृष्टी भाव प्रकट करनेवाली ऐसी शिल्पित की गई है।
महाबलीपुरम के वराह गुफा में भक्तों को सुरक्षा या अभय प्रदान करनेवाली देवी की प्रतिमाएं भी देखी जा सकती हैं। इस मूर्ति में चतुर्भुजा देवी स्थानक अवस्था में खड़ी है। उनके पार्श्व हस्त में एक चक्र और एक शंख है, उनके सिर पर एक छत्र है। एक हाथ कटावलंबित है तो दूसरा हाथ भक्त को अभय प्रदान करनेवाला है। इस प्रतिमा में, उनके चरणों में भक्त देवी को अपना सिर अर्पित कर रहा है। यहाँ, जैसा कि चित्रसूत्र में उल्लेख किया गया है, भक्त की त्याग भावना और बलिदान से माता मे उत्पन्न करुण रस के कारण देवी भक्त कों दर्शन देने के लिए स्वयं प्रकट हुई है।
नवरस और देवी शिल्प इस शृंखला के अगले भाग में, देवी शिल्प से अभिव्यक्त होनेवाले रौद्र रस का परामर्श लेंगे।

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